दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा अपने कारागार सुधार परियोजना एवं पुनर्वास कार्यक्रम अंतरक्रांति प्रकल्प के अंतर्गत स्थानीय कैथू जेल में तीन दिवसीय आध्यात्मिक चिंतन एवं ध्यान आयोजन कार्यक्रम आयोजित किया गया।
जिसके प्रथम दिवस संस्थान की ओर से दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी विज्ञानानंद जी ने कैदी बंधुओं को संबोधित करते हुए कहा कि अध्यात्म न केवल आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है, बल्कि शांति, सद्भाव और सार्वभौमिक एकता 'वसुधैव कुटुम्बकम' के वैश्विक संदेश का केंद्र भी है, जो इसे एक व्यावहारिक और हर पहलू में लागू करने योग्य जीवनशैली बनाता है।
भारत में अध्यात्म एक जीवंत परंपरा है जो ज्ञान, विज्ञान और जीवन के हर पहलू को आत्मिक दिव्यता से जोड़ती है, और पूरी मानवता के लिए एक मार्गदर्शक सिद्धांत के रूप में कार्य करती है। भारत में अध्यात्म का केंद्रीय विचार यह है कि "प्रत्येक आत्मा संभावित रूप से दिव्य है" और लक्ष्य इस आंतरिक दिव्यता को प्रकट करना है। यह केवल एक सिद्धांत नहीं है, बल्कि जीवन के हर पहलू में लागू होने वाला एक व्यावहारिक मार्ग है। योग, ध्यान, आयुर्वेद, और भक्ति जैसे मार्ग एक संपूर्ण जीवन जीने की विधि प्रदान करते हैं।
भारत की सांस्कृतिक विरासत वेदों, उपनिषदों, भगवद्गीता जैसे ग्रंथों पर आधारित है, जो कालातीत ज्ञान और एक उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने का मार्ग दिखाते हैं। ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्ववेद और उपनिषद आध्यात्मिक ज्ञान और आत्म-साक्षात्कार के मार्ग का आधार हैं। यह आंतरिक शांति और चेतना के विस्तार के लिए प्रयुक्त अभ्यास हैं, जिनका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में मिलता है। यह ईश्वर के प्रति प्रेम और समर्पण के माध्यम से दिव्यता को प्रकट करने का एक तरीका है। भारत में दर्शन और धर्म का गहरा संबंध है। भारत का आध्यात्मिक संदेश, "संपूर्ण विश्व एक परिवार है", दुनिया को शांति और सद्भाव की ओर ले जाने की क्षमता रखता है |
भोगवाद और संघर्ष से जूझ रहे वर्तमान समाज में अध्यात्म ही सभी समस्याओं का सटीक समाधान है। कार्यक्रम का शुभारंभ महात्मा बलदेव ने सुमधुर प्रार्थना के गायन से किया।
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अध्यात्म के बिना मानव का सम्पूर्ण विकास असम्भव -स्वामी विज्ञानानंद जी